Allahabad High Court Order जाने बहू का अधिकार | Best 2021
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Allahabad High Court Order जाने बहू का अधिकार | Best 2021
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Allahabad High Courts Order – परिवार में बहू के हक को बेटी से ज्यादा माना है। और आश्रित कोटे में आ रही दुकान बेटी की जगह बहू को मिली है। सार्वजानिक वितरण प्रणाली व्यवस्था में बहू को पारिवारिक सदस्य माना जाएगा। 

Allahabad High Court Order – इलाहबाद हाई कोर्ट ने मह्त्वपूर्ण विषय पर फैसला सुनाया है। और कहा की – बहू भी परिवार का हिस्सा होता है। उसे बेटी के समान ही अधिकार मिलने चाहिए और साल – 2019 के अपने ही फैसले को रद्द कर दिया। 

Allahabad High Court Order – सहकारी सस्ते गल्ले की दुकान ( राशन दुकान ) के मालिक की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद लाइसेंस धारी की पत्नी ने आश्रित कोटे के तहत दुकान आवंटन के लिए आवेदन दिया था। जिसे खाद्य पूर्ती अधिकारी ने यह कहकर मना कर दिया कि बहू को शासनादेश – 2019 में परिवार में सम्मलित नहीं किया गया है। 

नियमनुसार – बहू को मिलेगा पहला अधिकार 

Allahabad High Court Order – आपकी जानकारी के लिए बता दें – कि उत्तर प्रदेश राज्य ने वर्ष – 2016 में आवयशक वस्तु अधिनियम पास किया था। और इस नियम को आधार मानकर बहू को परिवार की श्रृंखला से बाहर कर दिया था। व इसी नियम का हवाला देकर वर्ष – 2019 में एक आदेश जारी किया गया था। 

Allahabad High Court Order – इलाहबाद कोर्ट ने लाइसेंस धारी की मृत्यु होने पर उनके वारिसों को सहकारी सस्ते गल्ले की दुकान आवंटन से रिलेटेड मामले में बहू को परिवार में सम्मलित करने का राज्य सरकार को दिशा -निर्देश दिया है। कोर्ट का फैसला आने के बाद लाइसेंसी व्यक्ति की मृत्यु होने के बाद इस पर प्रथम अधिकार पुत्र वधू का माना जाएगा। 

हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता पुष्पा देवी का आवेदन स्वीकार करने का कारण बताया और अपने दो केस उदहारण – 

गीता श्रीवास्तव  V/S उत्तर प्रदेश राज्य


उत्तर प्रदेश पॉवर कार्पोरेशन L.M.D सुधा जैन V/S उत्तर प्रदेश स्टेट 


बहू का जीवन -यापन संकटमय होने के कारण 

Allahabad High Court Order – याचिकाकर्ता पुष्पा देवी एक विधवा महिला है। व दो छोटे बच्चे नाबालिक अवस्था में है। पुष्पा देवी के पति की कुछ वर्ष पूर्व मृत्यु हो गई थी। जिसके बाद उत्तराधिकार के रूप में यह ( राशन की दुकान ) माता ( सास नाम -महादेवी ) के संचालन में चलती रही , BUT उनकी सास माता के देहांत होने व अन्य वारिस की अनुपस्थिति के कारण जीवन निर्वाह में कठनाईयो का सामना करना पड़ा। 

ALLAHABAD HIGH COURT ORDER ( images 1 )

हिन्दू विधि को कितनी शाखाओं में विभाजित किया गया है। ? 

( Allahabad High Court ) – हिन्दू विधि के अन्तर्गत दो विधि अपनायी गई है। वह निम्नलिखित है।

( 1 ) मिताक्षरा विधि – इस विधि का शाब्दिक अर्थ है –  सिमित अक्षरों वाली  |  यह विधि विज्ञानेश्वर द्वारा लिखित यञवल्क्य स्मृति टीका है। यह मुख्य विषयो से सांगत मामलों का ही वर्णन करती है। इसका उदयकाल ( 11 वी शताब्दी ) को माना गया है। 


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मिताक्षरा विधि की  ( 4 उपशाखाएँ  ) जो सम्पूर्ण भारत के अलग – अलग क्षेत्र में लागू होती है। 

  • बनारस की विधि – यह विधिः पँजाब और मिथिला राज्य को छोड़कर पूरे उत्तर भारत में लागू होती है। इसके                               अंतर्गत उड़ीसा और मध्य प्रदेश भी शामिल है। 
  • मिथिला की विधिः – यह विधिः मुख्यतः तिरहुत व बिहार में प्रचालित है। 
  • महाराष्ट्र व बम्बई की विधिः – यह विधिः पूरे माराष्ट्र व गुजरात प्रदेश में लागू है। इसके अन्तर्गत कनारा तथा                                                 मराठी क्षेत्र शामिल है। 
  • द्रविड़ या मद्रास की विधिः – यह विधिः पूरे तमिलनाडु में प्रचालित है। इसके अन्तर्गत तमिल , कर्नाटक व                                                 आन्ध्र प्रदेश शामिल है। 

( 2 ) दायभाग की विधिः – यह विधिः बंगाल व असम के कुछ क्षेत्रो में लागू है। इस विधिः का शाब्दिक अर्थ –                                                     उत्तरधिकर का बॅटवारा है। 

सुप्रीम कोर्ट जजमेंट – सास – ससुर के मकान में बहू को साथ रहने का अधिकार

( Allahabad High Court )
सुप्रीम कोर्ट ने पति के माता – पिता के साथ रह रहे साझा मकान में भी जीवन -यापन करने का अधिकार दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2020 को बहू से सम्बन्धित मामले मेँ एक न्यायिक आदेश पारित किया है। तीन न्यायधीशों की पीठ ने जिसकी अध्यक्षता जस्टिस अशोक भूषण द्वारा की गई थी। अशोक भूषण जी के समक्ष तरुण बत्रा का मामला सामने आया था और जिसकी सुनवाई को गम्भीरता से लिया गया था। जाने क्या है पूरा मामला ?
( Allahabad High Court ) – दरअसल , यह पूरा मामला घरेलू हिँसा से पीड़ित महिला का है। पीड़ित महिला का नाम अंजलि बत्रा व पति का नाम तरुण बत्रा है। पति अपने माता पिता के साथ ही रहता था। जिसमें पीड़ित महिला ने भरण – पोषण की याचिका हाई कोर्ट में लगाई थी 

हाई कोर्ट ने यह कहते हुए फैसला पति के पक्ष में सुरक्षित रखा कि – पति की स्व अर्जित सम्पति में ही पत्नी का अधिकार होता है। इस कोर्ट फैसले के खिलाफ महिला ने सुप्रीम कोर्ट  में अपील दायर की। 

सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिँसा अधिनियम – 2005 को आधार मानकर ही फैसला सुनाया और याचिका में दाखिल 150 पन्नो के पेज में 7 -8 सवालों के जवाब दिए और सुप्रीम कोर्ट ने यह उत्तर दिया कि  – पति से अलग सम्पत्ति की निर्वहन ही नहीं बल्कि साझा घर में भी हक़दार होगी।