Charge Sheet Par Police Ke Adhikar | पुनः विवेचना का अधिकार, इलाहाबाद हाईकोर्ट | Strong News 2022
Like and Share
 Charge Sheet Par Police Ke Adhikar | पुनः विवेचना का अधिकार, इलाहाबाद हाईकोर्ट | Strong News 2022
413 Views

 Charge Sheet के केस में दाखिल नाम के बाद पुलिस द्वारा पुनः विवेचना करते हुए नाम बढ़ाने को लेकर हाई कोर्ट ने Crpc के सेंक्शन 178 ( 8 ) के प्रोसीजर का हवाला देते हुए कहा की पुलिस को दोबारा विवेचना का अधिकार है। 

Allahabad High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी संज्ञेय अपराध की Charge Sheet अदालत में दाखिल किए जाने व  मजिस्ट्रेट के उस पर संज्ञान लिए जाने के बाद भी Police  को उस मामले में अग्रिम विवेचना करने का Rights  है। कोर्ट ने कहा कि Police के पास विवेचना की निर्बाध शक्ति है, वह Charge Sheet  दाखिल होने के बाद भी आगे की विवेचना जारी रख सकती है। इसके बाद Police के पास संपूरक आरोप पत्र जमा करने का अधिकार है।

यह Order न्यायमूर्ति अंजनी कुमार मिश्र और न्यायमूर्ति दीपक वर्मा की खंडपीठ ने Agra  के सुबोध जैन की याचिका खारिज करते हुए दिया है। अपीलकर्ता  का कहना था कि उसका सर्राफा  का व्यवसाय है। और एक आपराधिक मामले में लूटा गया माल खरीदने के सम्बन्ध में आरोप में पुलिस उसके खिलाफ जांच कर रही है


Read Me –

Plot Kharidne Se Pehle kya kya Dekhna Chahiye | Best 2022


जबकि अपीलकर्ता  का नाम एफआईआर में दर्ज नहीं है। और इस मामले में Police चार लोगों के खिलाफ पहले ही आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है और न्यायलय  ने उस पर संज्ञान भी ले लिया है। याची के लॉयर का कहना था कि एक बार पुलिस ने Charge Sheet  दाखिल कर दी व  मजिस्ट्रेट ने उस पर संज्ञान ले लिया तो फिर उसके बाद विवेचना End हो जाती है। फिर Police  कोर्ट की आज्ञा के बगैर अग्रिम विवेचना नहीं कर सकती है।

सरकारी वकील ने क्या दलील दी 

इस याचिका का विरोध करते हुए Government Lawyer  ने कहा कि Police  के पास विवेचना की निर्बाध शक्ति है और Charge Sheet  दाखिल होने एवं मजिस्ट्रेट के उस पर संज्ञान लेने के बाद भी Police अग्रिम विवेचना कर सकती है। और इस कार्य के  लिए उसे मजिस्ट्रेट की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। Police  के पास संपूरक Charge Sheet दाखिल करने का विकल्प है।

कोर्ट ने Crpc की धारा 173 (8) का हवाला देते हुए कहा इस Section  के प्रावधान से यह स्पष्ट है कि संज्ञेय अपराध में Police  को Charge Sheet  दाखिल होने व मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लिए जाने के बावजूद अग्रिम विवेचना जारी रखने का Rights  है। और इसके लिए मजिस्ट्रेट की आज्ञा  लेना अनिवार्य नहीं है।

इस प्रकार मामले के तथ्यों के तहत ( 9 मार्च 2019 ) को शिकायतकर्ता अपने भतीजे की शादी में खांडवी गया था। और वह दिन के समय  में अपने कमरे में आराम कर रहा था, और तभी अचानक एक अज्ञात लड़का कमरे में घुसा और वहां से रखा बैग व उठाकर भाग गया। बैग में  1 लाख रुपये से ज्यादा नकदी व सोने-चांदी के जेवरात व  मोबाइल था।


Read Me –LIC के IPO में निवेश:आपके पास है LIC की पॉलिसी तो आपको सस्ते में मिलेंगे शेयर, यहां जानें इससे जुड़ी जरूरी बातें


इस घटना की FIR सिकंदरा थाने में दर्ज कराई गई। Police ने चार अभियुक्तों जेल भेज दिया व  उनके खिलाफ अदालत में Charge Sheet दाखिल कर दी। मजिस्ट्रेट ने Charge Sheet पर संज्ञान भी ले लिया। उसके बाद Police  के संज्ञान में आया कि लूटा गया सामान अपीलकर्ता की दुकान पर बेचा गया है। इस पर Police  ने याची के खिलाफ जांच शुरू कर दी, और जिसे इस याचिका में चुनौती दी गई थी।

चार्ज शीट का मतलब क्या होता है.

Charge Sheet से तात्पर्य यह है की किसी व्यक्ति द्वारा Police Station में कोई FIR दर्ज करवा दी जाती है उसके पश्चात पुलिस द्वारा या पुलिस Officer  द्वारा FIR में अनुसंधान या जांच करना शुरू कर दिया जाता है। जब Police द्वारा अनुसंधान जारी रहता है उसमें पुलिस द्वारा सबूत देखे जाते हैं अगर Police को लगता है कि केस चलने योग्य है

Charge Sheet ( images )
( प्रतीकात्मक तस्वीर )

पुलिस द्वारा अदालत के समक्ष उस अभियुक्त की Charge Sheet पेश कर दी जाती है जिसे आप चालान पेश करना भी कहा जाता है पुलिस द्वारा अदालत के समक्ष चालान Section – 173 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत पेश  किया जाता है। गंभीर मामलों में Charge Sheet  पेश करने की अवधि 90 दिवस की होती हैं।

और आरोपी की गिरफ्तारी के 90 दिनों के भीतर Police  द्वारा मामले का अनुसंधान किया जाता है और सबूत जुटाए जाते हैं अगर आरोप पीड़ित पर जो लगे सही पाए जाते हैं तो उस पर मुकदमा पंजीकृत कर दिया जाता है अन्यथा केस निरस्त कर दिया जाता है।

जाँच अधिकारी की Charge Sheet के बाद न्यायालय सबूतों व तथ्यों के आधार पर अभियुक्तों के खिलाफ संज्ञान लेती है और उन्हें कोर्ट द्वारा समन जारी करती है। इसके बाद आरोप अभियुक्तों के अधिवक्ता द्वारा चार्ज बहस की जाती है

यदि आरोपित अभियुक्त के खिलाफ जांच एजेंसी को सबूत न मिले, तो वह Crpc की धारा-169 के अनुसार क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर देती है। अदालत क्लोजर रिपोर्ट में पेश सभी तथ्यों को देखती है और फिर मामले के शिकायती को Notice जारी करती है। जिस शिकायती को अगर क्लोजर रिपोर्ट पर आपत्ति है तो वह कोर्ट द्वारा इसे दर्ज कराता है। और क्लोजर रिपोर्ट पर जाँच अधिकारी की दलीलों को भी न्यायालय सुनती है।

  1. यदि अदालत को लगता है कि आरोपी के खिलाफ केस चलाने के लिए सबूत नहीं हैं तो वह क्लोजर रिपोर्ट को मान कर लेती है और Case बंद करने का हुक्म देते हुए पीड़ित अभियुक्तों को बरी कर देती है।
  2. क्लोजर रिपोर्ट के साथ पेश तथ्यों व सबूतों को देखने के बाद अगर अदालत को लगता है कि अभियुक्त के खिलाफ केस चलाने के लिए साक्ष्य हैं तो वह उसी क्लोजर रिपोर्ट को Charge Sheet  की तरह मानते हुए आरोपी मानकर समन जारी कर सकती है।
  3. यदि कोर्ट क्लोजर रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं होती, तो जाँच अधिकारी को आगे जांच के लिए कह सकती है।
  4. अदालतीय जानकार बताते हैं कि एक बार क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार होने के बाद भी जांच एजेंसी को बाद में पीड़ित अभियुक्तों के खिलाफ भरपूर सबूत मिल जाएं, तो दोबारा Charge Sheet दाखिल की जा सकती है, BUT एक बार ट्रायल खत्म हो जाए व अभियुक्त बरी हो जाए तो उसी मुकदमें  में दोबारा केस नहीं चलाया जा सकता।