CRPC Section 433 (2) Saja Me Chhoot Ke Sambandh Me | सुप्रीम कोर्ट को पर्याप्त कारण बताना होगा | Best Law Advice 2022
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CRPC Section 433 (2) Saja Me Chhoot Ke Sambandh Me | सुप्रीम कोर्ट को पर्याप्त कारण बताना होगा | Best Law Advice 2022
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CRPC Section 433 (2) – Saja Me Chhoot Ke Sambandh Me श्रीमान न्यायलय को आवेदन देते समय उसमे पर्याप्त कारण समाहित होने चाहिए सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी को उसकी कार्यशैली पर ध्यान दिया जाता है। 

CRPC Section 433(2) in Hindi – जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ व  जस्टिस अनिरुद्ध बोस की एकल पीठ ने कहा कि सजा देने वाली न्यायलय  के पीठासीन Officer  की राय में अपर्याप्त कारण दंड प्रक्रिया संहिता की Section – 432 (2) की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करेंगे।

श्रीमान न्यायलय  ने पाया कि सीआरपीसी की धारा 433 ( २) का उद्देश्य कार्यपालिका को सभी प्रासंगिक सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए एक सूचित फैसला  लेने में सक्षम बनाना है।

Crpc Section 433 (2 ) का लाभ लेने के लिए आजीवन कारावास की सजा काट रहे याचिकाकर्ता ने छत्तीसगढ़ कारागार Rules – 1968 के नियम 358 के अनुसार  प्रतिवादी को समय पूर्व रिहाई के लिए एक आवेदन कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया।

Crpc Section 433(2) – दुर्ग स्थित केंद्रीय Jail के जेल अधीक्षक ने विशेष न्यायाधीश, से दुर्ग Advice मांगी कि क्या याचिकाकर्ता को सजा माफी पर छोड़ा  जा सकता है। याचिकाकर्ता ने 2 जुलाई 2021 को विशेष न्यायाधीश ने अपनी Advice  दी कि केस से सम्बन्थित मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए याचिकाकर्ता की सभी शेष सजा में छूट की आज्ञा  देना उचित नहीं होगा।


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इसलिए Government  के विधि विभाग ने माना कि चूंकि यह सजा सुनाने वाली कोर्ट के पीठासीन न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता की रिहाई के संबंध में सकारात्मक Advice  नहीं दी है, और इसलिए उसे रिहा नहीं किया जा सकता है। इस बात से नाराज  होकर याचिकाकर्ता ने रिट याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजे पर दस्तक दी है।

Crpc Section 433(2) – इस आवेदन का विरोध करते हुए राज्य ने तर्क दिया कि सजा में छूट का प्रावधान करने या अस्वीकार करने के लिए निस्संदेह विवेकाधिकार है और यह State Government  को याचिकाकर्ता को रिहा करने का निर्देश देने के लिए कोई रिट याचिका जारी नहीं की जा सकती है।

जबकि न्यायलय यह निर्धारित करने के लिए Government के निर्णय की समीक्षा कर सकती है कि क्या यह एक मनमाना था। यह सरकार की Power को  हड़प नहीं सकता है और यह स्वयं छूट प्रदान नहीं कर सकता है। और जहां कार्यपालिका द्वारा Power  का प्रयोग मनमाना पाया जाता है। वहाँ दोषी के मामले पर नए सिरे से सोच – विचार करने के लिए Officer को निर्देशित किया जा सकता है।

Crpc Section 433(2) – इस प्रमुख विषय  के बारे में कि क्या पीठासीन न्यायाधीश की Advice  बाध्यकारी होगी।  अदालत  ने कहा कि भारत संघ V / S  श्रीहरन (2016) 7 SCC 1 में यह विशेष रूप से नहीं माना गया था कि पीठासीन न्यायाधीश की Advice  बाध्यकारी होगी। BUT  यह माना गया कि छूट पर Government  का निर्णय संबंधित न्यायलय  के पीठासीन अधिकारी की राय से निर्देशित होना चाहिए।

अदालत ने याचिकाकर्ता के लिए निम्न बातों का अवलोकन किया 

Crpc Section 433 (2) in Hindi –
इन कारकों में इस प्रकार आकलन करना शामिल है

( A )  कि क्या Crime बड़े पैमाने पर समाज को प्रभावित करता है।

( B ) क्या अपराध के दोहराए जाने की संभावना है।  

( C ) अपराधी की भविष्य में Crime  करने की क्षमता

( D) क्या  अपराधी को कारागार में रखकर कोई सार्थक प्रयोजन सिद्ध हो रहा हो 

लक्ष्मण नस्कर V/S पश्चिम बंगाल राज्य ( SC ) व  हरियाणा राज्य V/S जगदीश में इस न्यायालय ने इन मामलो का भी हवाला दिया है।

भारत का संविधान – 1950 व अनुच्छेद 32,व 226 – दंड प्रक्रिया संहिता – 1973 Section  432

अदालतीय समीक्षा –
 
Crpc Section 433 (2) in Hindi – सुप्रीम कोर्ट ने एक दोषी द्वारा अपीलीय  रिट याचिका की अनुमति दी व  जिसके सजा माफी के लिए आवेदन को Dismiss  कर दिया गया था। अतः  विशेष न्यायाधीश दुर्ग को पर्याप्त तर्क-वितर्क  के साथ नए सिरे से छूट के लिए आवेदन पर Advice  प्रदान करने का निर्देश दिया।