Dhara 141 NI ACT मात्र फ़र्म का पार्ट्नर और गारंटर होने से व्यक्ति चेक बाउन्स के लिए ज़िम्मेदार नहीं होगा | Best Supreme Court 2022
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Dhara 141 NI ACT मात्र फ़र्म का पार्ट्नर और गारंटर होने से व्यक्ति चेक बाउन्स के लिए ज़िम्मेदार नहीं होगा | Best Supreme Court 2022
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Dhara 141 NI ACT – सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि – कंपनी / फर्म का मात्र पार्टनर / गारंटर होने से उस व्यक्ति पर चेक बाउंस की आपराधिक धाराओं को शामिल नहीं किया जा सकता है।

Dhara 141 NI ACT – सोमवार के दिन सुप्रीम कोर्टने Judgement सुनाया कि Check Bounce के मामलों के लिए आपराधिक दायित्व NI ACT की धारा 138 किसी व्यक्ति पर सिर्फ इसलिए नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि वह एक फर्म/ कंपनी में भागीदार है जिसने लोन  लिया था या फिर वह व्यक्ति लोन के लिए गारंटर था।

न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी तथा न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की खंडपीठ के अनुसार

Dhara 141 NI ACT – धारा 141 के संदर्भ में क्रिमनल कानूनों में प्रतिवर्ती दायित्व और यह केवल इसलिए तय नहीं किया जा सकता है क्योंकि वह नागरिक दायित्व फर्म/ कंपनी के भागीदारों पर बोझ पड़ेगा।

माननीय श्रीमान न्यायलय ने आगे फैसला सुनाया – कि Dhara 141 NI ACT के प्रावधान जो वह काल्पनिक मानते हुए प्रतिवर्ती दायित्व को लागू/ निर्वहन करते हैं, और जिसके लिए फर्म / कंपनी द्वारा Crime करने की भी आवश्यकता होती है।


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सुप्रीम चौर्र ने एक याचिका में यह फैसला सुनाया, जहां एक फर्म के पार्टनर ने धारा – 138 NI ACT के तहत उसकी सजा को चुनौती दी। और अपीलकर्ता की सजा को छत्तीसगढ़ High Court ने भी बरकरार रखा था।

Dhara 141 NI ACT in Hindi – तथा इस मामले में प्रतिवादी (बैंक ऑफ बड़ौदा) ने मेसर्स ग्लोबल पैकेजिंग फर्म को नकद लोन फैसलिटी और सावधि लोन प्रदान किया था और जिसमें अपीलकर्ता पार्टनर / भागीदार है।

यह एक नाम सिमैया हरिरामन (फर्म में एक भागीदार/ पार्टनर भी) ने फर्म/ कंपनी को दी गई लोन सुविधाओं के लिए अपने नाम पर 3 चेक जारी किए।

उक्त चेक बाउंस होने के बाद, प्रतिवादी बैंक ने हरिरामन व अपीलकर्ता के खिलाफ अंडर सेक्शन -138 NI ACT में शिकायत दर्ज की।

जब यह मामला Supreme Court में पहुंचा, तो पीठ ने कहा कि यह एक स्वीकृत करने योग्य तथ्य है कि अपीलकर्ता ने Check  जारी नहीं किया था। , ( Dhara 141 NI ACT )

श्रीमान न्यायलय ने आगे कहा कि यह दिखाने के लिए Evidence के अभाव में कि अपीलकर्ता फर्म के Check जारी करने के मामलों में शामिल था, अपीलकर्ता की यह दोषसिद्धि को बना कर नहीं रखा जा सकता है। न्यायिक बेंच ने इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए गिरधारी लाल गुप्ता V /S  डीएम मेहता And अन्य के निर्णय पर भरोसा किया।

यह बात ध्यान देने योग्य है कि शीर्ष न्यायलय ने माना कि अपीलकर्ता को केवल इसलिए दोषी करार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि वह एक फर्म में भागीदार के रूप में है जिसने लोन लिया था।

Dhara 141 NI ACT – इस प्रकार यह देखते हुए, श्रीमान न्यायलय ने अपीलकर्ता को बरी कर दिया व  निचली COURT द्वारा पारित व  पुष्टि किए गए दोषसिद्धि Order को रद्द कर दिया।

मुख्य शीर्षक: दिलीप हरिरामनी V / S बैंक ऑफ बड़ौदा
केस नं० : C R L अपील नंबर: 767/2022

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