Police ,आरोपी से मिल जाएं क्या करें | Best Legal Advice 2022
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Police ,आरोपी से मिल जाएं क्या करें | Best Legal Advice 2022
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police complaint kaise kare – पुलिस आरोपी से मिल जाए तो क्या करें। यह हमें बहुत बार देखने को मिलता है। और शिकायतकर्ता को सही जानकारी नहीं होने से कई बार मुख्य आरोपी के सामने हार मान कर चुप बैठना पड़ता है। और उसे अपने सवाल का जवाब नहीं मिलता है। आज हम इसी विषय पर विस्तार से जानेंगे। 

पुलिस ( Police )को जनता की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी कानून ( kanoon )ने दी है। और जब भी कोई अपराध ( Crime )होता है तब पुलिस उस अपराध पर एफआईआर ( FIR ) दर्ज करती है और कोर्ट( Court )में चालान प्रस्तुत करती है। और किसी भी अपराध में पक्ष अभियुक्त का होता है 

Police Complaint Kaise Kare – और एक शिकायतकर्ता ( Shikayatkarta )का होता है। और कभी-कभी देखने में यह भी आता है कि पुलिस ( Police )द्वारा एफआईआर दर्ज की गई, एफआईआर ( FIR )दर्ज करने के बाद अन्वेषण किया गया। अन्वेषण के बाद न्यायालय ( Court ) में चालान प्रस्तुत नहीं किया गया और पुलिस ने आरोपियों ( Victim )को क्लीन चिट देते हुए क्लोजर रिपोर्ट ( Riport )या फाइनल रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी।

और इस स्थिति में शिकायतकर्ता व्यथित हो जाता है। क्योंकि शिकायतकर्ता अपनी शिकायत ( Complant )लेकर पुलिस के पास जाता है। और उसके साथ घटने वाले किसी अपराध ( Crime ) की जानकारी उसके द्वारा पुलिस को दी जाती है। और उसकी जानकारी ( Information ) के आधार पर पुलिस एफआईआर दर्ज करती हैं। और ऐसी एफआईआर के बाद अन्वेषण होता है।

हालांकि पुलिस ( Police ) के पास यह अधिकार सुरक्षित है कि यदि वह अन्वेषण में उसे जिन व्यक्तियों के नाम पर एफआईआर ( FIR ) की गई थी उनके संबंध में कोई सबूत ( Evidence ) नहीं मिले तब पुलिस उन्हें क्लीन चिट दे देती है।

Police Complaint in Hindi – और उन्हें न्यायालय में आरोपी Victim ) बनाकर पेश नहीं किया जाता है बल्कि पुलिस ( Police ) द्वारा यह कह दिया जाता है कि जिन व्यक्तियों के विरुद्ध एफआईआर ( FIR ) दर्ज की गई थी उनका अपराध में कोई भाग नहीं है। और ऐसे कोई सबूत प्राप्त नहीं हुए है।  जिससे उन पर दंड प्रक्रिया संहिता ( CRPC ) की धारा 173(3) अंतर्गत चालान पेश किया जा सके। और कभी कभी आरोपियों के नहीं मिलने पर भी पुलिस ( Police ) क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत कर देती है।

Police Shikayat – कानून ( Kanoon ) ने इस स्थिति में शिकायतकर्ता को कुछ अधिकार ( Rights ) दिए हैं। और शिकायतकर्ता अपनी ओर से कुछ ऐसे कानूनी ( Kanoon ) कदम उठा सकता है जिससे जिन व्यक्तियों पर एफआईआर ( FIR ) की गई है उन पर मुकदमा ( Case ) चलाया जा सके।


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प्रोटेस्ट पिटिशन का प्रयोग करना

प्रोटेस्ट पिटिशन ( Pition ) एक प्रकार की विरोध याचिका है, और जिसमें शिकायतकर्ता ( Shikayatkarta ) अपना विरोध दर्ज करता है।  और दंड प्रक्रिया संहिता ने एक मजिस्ट्रेट को पुलिस ( Police ) से अधिक शक्तिशाली बनाया है। और सहिंता में कुछ ऐसे प्रावधान ( Rules ) किए गए हैं जहां पर पुलिस की मनमर्जी कार्य चल पाना मुश्किल होती है।  और अगर कोई शिकायतकर्ता ( Shikayatkarta ) व्यथित है तब वह जिस न्यायालय में पुलिस ने अपनी क्लोजर या फाइनल रिपोर्ट ( Riport ) प्रस्तुत की है  और उस ही न्यायालय ( Court ) में शिकायतकर्ता प्रोटेस्ट पिटिशन लगा सकता है।

इस प्रकार की प्रोटेस्ट पिटिशन में शिकायतकर्ता को न्यायालय की जानकारी, एफआईआर ( FIR ) की जानकारी, जो सबूत ( Evidience ) शिकायतकर्ता के पास उपलब्ध है उसकी जानकारी ( Information ) और पुलिस ( Police ) द्वारा अन्वेषण में जो चूक की गई है उसकी जानकारी लिखकर न्यायालय ( Court ) के समक्ष पेश करना होती है। न्यायालय ऐसी जानकारी ( Information ) मिलने के बाद चार प्रकार के कदम उठा सकता है जिस के संबंध में भारत के उच्चतम न्यायालय ( Supreme Court ) ने दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं।

प्रोटेस्ट पिटीशन के मामले में एक मजिस्ट्रेट की शक्तियां

आप अगर किसी मामले में पुलिस ( Police ) द्वारा क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती है। और फिर शिकायतकर्ता द्वारा प्रोटेस्ट पिटिशन ( Pition ) दाखिल की जाती है, और ऐसी स्थिति में एक मजिस्ट्रेट ( Judge ) के पास में कुछ शक्तियां होती हैं।

Complaint Notice

अगर पुलिस ( Police ) क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत करती है और तब शिकायतकर्ता को मजिस्ट्रेट ( Judge ) द्वारा एक नोटिस जारी किया जाता है। और इस नोटिस में इस बात का उल्लेख होता है कि जिस प्रकरण या मामले की आपके द्वारा एफआईआर ( FIR ) दर्ज की गई है उस प्रकरण में पुलिस को कोई सबूत ( Evidence ) नहीं मिले हैं। और जिन लोगों के नाम पर एफआईआर ( FIR ) दर्ज की गई थी

और उन लोगों को मामले में आरोपी नहीं बनाया जा रहा है। और यदि आपको इस बात पर कोई आपत्ति हो तो आप न्यायालय में प्रस्तुत या हाजिर होकर अपनी आपत्ति रखें।

अगर शिकायतकर्ता ( Shikayatkarta ) को किसी प्रकार से कोई आपत्ति नहीं है तब मजिस्ट्रेट ( Judge ) ऐसी क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लेता है और अपना आदेश ( Order ) पारित कर देता है। लेकिन शिकायतकर्ता ( Shikayatkarta ) अपनी ओर से कोई आपत्ति प्रस्तुत करता है तब मजिस्ट्रेट ( Judge ) के पास दूसरी भी शक्तियां है।

CRPC की धारा – 190 का प्रयोग करना

शिकायतकर्ता द्वारा प्रोटेस्ट पिटिशन ( Pition ) दाखिल करने पर मजिस्ट्रेट मामले में संज्ञान लेता है। और धारा – 190 के अधीन मजिस्ट्रेट ( Judge ) संज्ञान लेकर आरोपियों के विरुद्ध वारंट ( Warant ) जारी कर देता है। और पुलिस ( Police ) को उनकी गिरफ्तारी करने के दिशा निर्देश देता है और मामले में जांच टीम बैठा देता है।

और इस जांच में यह देखा जाता है कि पुलिस ( Police ) द्वारा जो क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत की गई है क्या वह  न्याय के बिंदु पर सही है या फिर अन्वेषण में किसी भी प्रकार की कोई चूक या छोड़  गई है। और कहीं जानबूझकर आरोपियों ( Vicitms ) को बचाया तो नहीं गया है।

पुनः अन्वेषण या जाँच के लिए 

आप धारा – 190 के अधीन मजिस्ट्रेट ( Judge ) संज्ञान करने के बाद पुलिस ( Police ) को फिर से अनुसंधान करने तथा फिर चालान ( Chalan ) प्रस्तुत करने हेतु निर्देशित कर सकता है।

और मजिस्ट्रेट ( Judge ) अपनी जांच में अगर यह पता है कि पुलिस द्वारा अनुसंधान करने में किसी प्रकार की कोई चूक ( Mistake ) की गई है तब वह पुलिस अधिकारियों को यह निर्देशित या आज्ञा करता है कि वह अनुसंधान या परिक्षण फिर से करें और अनुसंधान के बाद अपनी रिपोर्ट ( Riport ) प्रस्तुत करें। और इस स्थिति में मजिस्ट्रेट ( Judge ) गवाहों को बुलाकर उनके बयान भी दर्ज कर सकता है।