Supreme Court -बैंक जमा राशि भरोसे पर नहीं रखता | Best 2022
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Supreme Court -बैंक जमा राशि भरोसे पर नहीं रखता | Best 2022
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Supreme Court Judgement in Hindi – एक बैंकर्स का जमाकर्ता से रिलेशन केवल लेनदार व देनदार का होता है। बैंक किसी भी ग्राहक की जमा पूंजी को भरोसे पर नहीं रखता है। माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने एक केस की सुनवाई के दौरान बैंक व ग्राहकों के सम्बन्ध पर मह्त्वपूर्ण टिप्पड़ी की है। 

Supreme Court – सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक याचिका की सुनवाई के दौरान कहा की बैंक में जमा किया गया धन वह बैंक में एक ट्रस्टी के रूप में नहीं होता है। वह बैंकर के फण्ड का हिस्सा बन चूका होता है। और यह एक बैंक ग्राहक द्वारा जमा की गई राशि का भुगतान करने के लिए कानूनी सविंदा दायित्व का निर्वहन होता है। और यह एक निश्चित ब्याज की मांग की दर पर सहमत होता है। 

Chief Justice of India NV Ramana say – भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना कहते हैं।

Supreme Court Judgement in Hindi – चीफ जस्टिस एनवी रमाना व जस्टिस सूर्यकांत तथा जस्टिस हिमा कोहली ने यह एक बैंक पूर्व प्रबंधक की अपील पर फैसला सुनाते वक्त कहा जिसे ( IPC की धारा – 409 , धारा – 420 , धारा – 477A ) के अनुसार आपराधिक विश्वासघात पहुँचाना , धोखाधड़ी करना , बैंक खातों में जालसाजी करना में शामिल अपराधों के लिए आरोप तय किया गया था। 

जाने क्या है पूरा मामला – Know what is the whole matter

Supreme Court – C. Vinay Kumar जिसकी सँख्या  ( आरोपी Number – 3 ) दिखायी गई है। एक एजुकेशनल निशिता अकैडमी का कैशियर के पद पर नियुक्त है। उन्होंने अकैडमी के कैशियर व होल्ड रखने के नाते अपनी क्षमता के अनुसार , 5 लाख रूपए में श्री राम ग्रामीण बैंक शाखा निजामाबाद एक कर्रेंट अकाउंट जिसकी खाता संख्या – 282 खोला गया था।

Supreme Court Judgement – अपीलीय N. राघवेन्द्र आरोपी Number – 1 व 3 का ( Brother in Law अर्थात साला का रिश्ता था ) और वह एक ब्रांच मैनेजर के पद पर आसीन था। ( आरोपी Number 2 , संध्या रानी ) यह साल 1991 से 1996 तक बैंक में कलर्क कम कैशियर के पद सवरूप कार्य एक ही बैंक में किया था। और इन सभी ने अपने पद पर रहते हुए अपनी पोजीशन का फायदा उठाया और अकैडमी से 10 लाख रूपए की जमा पैसा निकालने की आज्ञा देकर आरोपी Number 3 के तहत षड्यंत्र रचा , और यह जानते हुए की खाते में रूपए निकालने के लिए कम है। 

Supreme Court Case 2021 – आरोपित व्यक्तियों का कार्य कथित ठीक नहीं था यह सही प्रकार के तौर -तरीके में शामिल नहीं होता है। अपीलकर्ता द्वारा अपने शाखा प्रबंधक के पद पर रहते हुए अपनी कार्य क्षमता अनुसार 3 लूज -लिफ़ चेक पास किय और उस धन  राशि निकालने का ब्यौरा जानबूझकर अपने बहीखाता में दर्ज नहीं किया है। तथा तीसरे चेक पर ( आरोपी Number 3 ) के पक्ष में भुगतान राशि को दर्शाया गया है। जहाँ जांच में पाया गया की ( आरोपी -3 ) का साइन चेक से मेल नहीं होता है
जहाँ अपीलीय कर्ता ( 24 – 02 – 1995 व 25 02 – 1995 ) को लगातार ( 10 लाख रूपए ) , ( 4 लाख रूपए ) , की उक्त धनराशि के लिए  ( 2 F.D ) का वक्त ख़त्म होने से पहले बंद करने का भी आरोप लगाया गया था। और यह सत्यजीत रेड्डी के नाम पर था। बैंक द्वारा जब खाते में ( 14 लाख रूपए ) जमा के स्थान पर ( 4 लाख रूपए ) बही में दिखाए गए। बाकि बची हुई ( 10 लाख रूपए ) गुप्त तरीके से निकालने के इरादे से रखे गए


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Supreme Court Case 2021 – जब लेखा – परीक्षक द्वारा जाँच की गई तो कई  गड़बड़ियों को पाया गया और  अपीलीय कर्ता निजामाबाद की शाखा से प्रधान कार्यालय में ट्रान्सफर कर दिया गया। व गहन जाँच का आर्डर दिया गया। तथा उसी ने हैदराबाद के बैंक मैनेजर , व केन्द्रीय जाँच ब्यूरो टीम को एक लिखित पत्र में शिकायत करने को कहा। 


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Supreme Court Judgement – ( C.B.I टीम ) ने उक्त मामले का संज्ञान लेते हुए IPC की धारा – 409 , धारा – 477 ( A ) , धारा – 120 ( B ) , तथा  धारा – 13 ( 2 ) व ( P.C ACT ) की धारा – 13 ( 1 ) ,  ( C ) , ( D ) को भी लगाया गया , और FIR में यह धारा लिख कर मामला दर्ज किया गया। सीबीआई के जज द्वारा जाँच व आरोप पत्र दाखिल होने के बाद अपीलकर्ता व साझेदार आरोपी के खिलाफ आरोप तय किए गए ,

और विशेस जज कोर्ट द्वारा ( 28 03 – 2020 ) को फैसला सुनाते हुए ( IPC के Section – 120 ( B ) , 13 ( दो ) , व  P.C ACT – Section – 13 ( 1 ) (  सी ) के अपराधों से आरोपी Number – 2 , 3  को छोड़ दिया गया।  तथा मुख्य अपीलकर्ता को दोषी मानकर सजा सुनाई , इस फैसले को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता ने हाई कोर्ट में अपील दायर की इस पर हाई कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए प्रथम दो ( F.D.R ) को समय से पहले प्रयोग करने का दोषी माना | 

सुप्रीम कोर्ट तथ्य || Supreme Court Fact

Supreme Court Judgement in Hindi – सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट पीठ फैसले पर संज्ञान लेते हुए IPC की धारा – 409 , व 420 , व  477 ए के अनुसार आरोप को सही साबित करने के लिए सभी जरुरी सामग्री को देखा गया और जब तक यह आरोप साबित नहीं हो जाता एक लोक सेवक , या बैंकर आदि को संपत्ति सौंपी गई थी वह व्यक्ति आरोपी है। और पीठ ने इसका उल्लेख एक वाद शीर्षक पर विचार करते हुए कहा 

Supreme Court Judgement – सदुपति नागेश्वर राव V/S आंध्र प्रदेश स्टेट – 2012 , 8 sc 547 के वाद का जिक्र करते हुए कहा – की यह अभियोजन पक्षकार को साबित करना होता है की वह आरोपी  जो एक बैंकर है उसे संपत्ति सौंपी गई और जिसके लिए वह विधि तरीके से उत्तरदायी व एक आपराधिक विश्वासघात से परिपूर्ण है।
जज पैनल ने आगे कहा – की किसी सार्वजानिक संपत्ति को सौंपना और Section – 405 में बताए गए तरीकों से हेराफेरी करके यूज़ करना इस धारा के उल्लघन को दर्शाता है। और यह किसी लोक सेवक या बैंकर को दंडनीय बनाने की अनिवार्य शर्त है। 

Supreme Court Case 2021 – जज पैनल ने इस सम्बन्ध पर ध्यान दिया की Section – 405 में बेईमानी शब्द को प्रमुख रूप से शामिल किया गया था। इसलिए यह मीन्स – रिया दुर्भावनापूर्ण के अस्तित्व को जागृत करता है। अन्य शब्दों में बिना किसी दुर्विनियोजन के किसी व्यक्ति को सौंपी गई संपत्ति का केवल प्रतिधारण आपराधिक विश्वासघात के दायरे में नहीं आ सकता है।

जब तक आरोपी द्वारा कानून या अनुबंध के उल्लंघन में कुछ वास्तविक उपयोग नहीं किया जाता है, बेईमान इरादे से जोड़ा जाता है, तब तक कोई आपराधिक विश्वासघात नहीं होता है। दूसरी महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति ‘गलत विनियोग’ है जिसका गहन अर्थ यह हुआ किसी के यूज़ के लिए गलत तरीके से अलग कर प्रयोग करना व मालिक का बहिष्कार या निकालना | 

Supreme Court ने IPC के Section – 409 के विषय पर दिशा निर्देशित की क्योकि जब तक यह निर्कर्ष नहीं निकलता की आरोपी बैंकर है। जिसे व्यवहारतं संपत्ति सौंपी गई थी। और ऐसे व्यक्ति ने आपराधिक विश्वासघात किया था, धारा 409 आईपीसी आकर्षित नहीं हो सकती है। ‘संपत्ति का सौंपना’ एक व्यापक और सामान्य अभिव्यक्ति है। अभियोजन पक्ष पर प्रारंभिक दायित्व यह का होता है कि विचाराधीन संपत्ति अभियुक्त को ‘सौंपी’ गई थी, यह, यह साबित करने के लिए आवश्यक नहीं है कि संपत्ति को सौंपने या उसके दुरुपयोग का वास्तविक तरीका क्या है।

जहां ‘सौंपा’ को अभियुक्त द्वारा स्वीकार किया जाता है या अभियोजन पक्ष द्वारा स्थापित किया जाता है तो यह साबित करने का बोझ आरोपी पर स्थानांतरित होता है। 

Supreme Court Judgement in Hindi – यह दी गई संपत्ति कानूनी दायित्व और सविदात्मक प्रकार से सौंपी गई थी। जो तरीका सही प्रकार से स्वीकार भी था। और जब जाँच शिकायत में पूरी तरह से साफ नहीं हो जाता की किया गया कार्य दुर्भावनापूर्ण कपटयोग्य , बेईमानी से ओतप्रोत था। और शिकायतकर्ता रूपए लेकर भाग नहीं जाता

Section – 420 का अपराध नहीं माना जाएगा। तथा यह केवल और केवल अनुबंध के उल्लंघन के समान हो सकता है। धारा 420 आईपीसी के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए, पीठ ने कहा कि धारा 420 आईपीसी के प्रावधानों को आकर्षित करने के लिए, अभियोजन पक्ष को न केवल यह साबित करना होगा कि आरोपी ने किसी को धोखा दिया है लेकिन यह भी कि ऐसा करके उसने उस व्यक्ति को बेईमानी से प्रेरित किया है जिसे संपत्ति देने के लिए धोखा दिया गया है। बी सत्यजीत रेड्डी से संबंधित 2 एफडीआर के अनधिकृत समयपूर्व नकदीकरण का पक्ष इसमें पीठ ने कहा। 

Supreme Court Judgement – जज पैनल कमेटी ने कहा की – 1 – सत्यजीत रेड्डी ने किसी भी प्रकार से नुकसान का आरोप लगाते हुए शिकायत नहीं की थी। , 2 – तथा उनके 22 व 24 फरवरी के किसी भी लिखित अनुरोध का खण्डन नहीं हुआ है। ,

3 – अभियोजन पक्ष ने निश्चित रूप से बी सत्यजीत रेड्डी को, समय से पहले बंद होने के बाद भी, उन एफडीआर पर ब्याज का भुगतान साबित किया है लेकिन वह भुगतान अपीलकर्ता द्वारा अपने व्यक्तिगत खाते से किया गया था और इस तरह के भुगतान के लिए किसी भी सार्वजनिक निधि का विनिवेश नहीं किया गया है , 4 – सत्यजीत रेड्डी ( F.D.R ) के वक्त से पहले और नकदीकरण के बाद भी ब्याज पा रहे है। और यह गलत ढ़ग से प्राप्त धन हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है। 

Supreme Court – और इसमें किसी प्रकार का नुकसान दिखाई भी नहीं दिया है। इस प्रकार उपरोक्त की पृष्ठभूमि में, पीठ ने अपील की अनुमति देते हुए कहा- -बैंक को कोई वित्तीय नुकसान नहीं हुआ -हमारे सामने रिकॉर्ड यह नहीं दर्शाता है कि बी सत्यजीत रेड्डी या बैंक के किसी अन्य ग्राहक को कोई आर्थिक नुकसान हुआ है। -हमारे सामने सामग्री आरोपी व्यक्तियों के बीच किसी साजिश का खुलासा नहीं करती है। किसी भी विश्वसनीय सबूत के अभाव में, जो मन की एक पूर्व बैठक को प्रकट कर सकता था, हाईकोर्ट ने यह मानने में गलती की कि अपीलकर्ता और अन्य अभियुक्तों ने आरोपी नंबर 3 को अनुचित लाभ पहुंचाने के लिए लेन-देन की योजना बनाई।

Supreme Court ( hd images )

Supreme Court Judgement in Hindi – अपीलकर्ता ने शाखा प्रबंधक के रूप में अपने पद का दुरूपयोग कर घोर कदाचार किया। अंतिम परिणाम के बावजूद, अपीलकर्ता की शक्तियों का दुरुपयोग स्पष्ट रूप से बैंक को वित्तीय नुकसान के जोखिम में डालता है। -अपने कर्तव्यों की अवहेलना के बावजूद, अपीलकर्ता के खिलाफ साबित कोई भी कार्य ‘आपराधिक कदाचार’ नहीं है या यह धारा 409, 420 और 477-ए आईपीसी के दायरे में नहीं आता है। कोर्ट ने अपीलकर्ता के आचरण को खारिज किया

Supreme Court – हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया, लेकिन कहा कि एक बैंक अधिकारी के रूप में उसका आचरण अशोभनीय था। अदालत ने कहा, “हालांकि वह आईपीसी की धारा 409, 420 और 477-ए के निषिद्ध क्षेत्र (क्षेत्रों) में अतिक्रमण नहीं करने के लिए काफी चतुर था, लेकिन जाँच में यह साफ पाया गया की बैंक को वित्तीय हानि झेलने का कठोर प्रयास किया गया इसलिय यह मामला विभागीय कदाचार का बनता है।

और बैंक के सेवा कार्यो से हटाया जाना ठीक है। इसलिए पीठ ने स्पष्ट किया कि बरी करने से वह बहाली का हकदार नहीं होगा। ( Supreme Court ) 

( Supreme Court Case 2021 ) –

केस शीर्षक: एन. राघवेंद्र बनाम आंध्र प्रदेश राज्य, सीबीआई| 2010 की आपराधिक अपील संख्या 5 कोरम: सीजेआई एनवी रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली सिटेशन: एलएल 2021 एससी 765